झारखंड, भारत का एक खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है, Chota Nagpur Plateau जिसकी भौगोलिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है — Chota Nagpur Plateau यह पठार न केवल राज्य की भू-आकृति को परिभाषित करता है, बल्कि इसके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और पारिस्थितिक परिप्रेक्ष्य को भी गहराई से प्रभावित करता है। यह ब्लॉग आपको छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्र की विस्तृत जानकारी, उसकी उत्पत्ति, भूगर्भीय संरचना, जलवायु, नदियाँ, वनस्पति, खनिज संपदा, कृषि, पर्यटन, जनजातीय जीवन और उसकी सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराएगा।
छोटा नागपुर का पठार: एक परिचय
छोटा नागपुर का पठार, भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक विशाल भूभाग है, जो मुख्य रूप से झारखंड राज्य में फैला हुआ है। यह पठार बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों तक भी विस्तृत है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 65,000 वर्ग किलोमीटर है।
यह पठार भारत के प्राचीनतम भू-भागों में से एक है और इसका निर्माण मुख्यतः आग्नेय चट्टानों से हुआ है। इसका मुख्य भाग तीन उप-पठारों में विभाजित है:
- रांची पठार – औसत ऊँचाई 600-800 मीटर
- हजारीबाग पठार – ऊँचाई 600 मीटर के आस-पास
- कोडरमा और गिरिडीह पठार – थोड़ा कम ऊँचाई पर
भूगर्भीय संरचना और उत्पत्ति
छोटा नागपुर का पठार भारत की पेनिनसुलर प्लेट का हिस्सा है और यह धरती की प्राचीनतम चट्टानों में से एक है। इसका निर्माण लगभग 2.5 अरब वर्ष पहले हुआ था। यहां मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार की चट्टानें पाई जाती हैं:
- आग्नेय चट्टानें (Granite, Gneiss)
- परतदार चट्टानें (Schist, Phyllite)
- धात्विक चट्टानें (metamorphic rocks)
इस क्षेत्र में उच्च स्तर की विवर्तनिक गतिविधियाँ (tectonic movements) और ज्वालामुखीय प्रक्रियाएं भी देखी गई हैं, जिससे यह खनिजों का एक अद्वितीय भंडार बन गया।
प्रमुख नदियाँ
छोटा नागपुर का पठार कई नदियों का उद्गम स्थल है। यहाँ की नदियाँ जलवायु, कृषि और जीवनशैली को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। कुछ प्रमुख नदियाँ:

- स्वर्णरेखा नदी – रांची से निकलती है और हुंडरू जलप्रपात बनाती है।
- दामोदर नदी – औद्योगिक क्षेत्र का आधार, कई बांधों का निर्माण इसी पर हुआ है।
- बराकर नदी
- शंख और दक्षिण कोयल नदी
- सुबर्णरेखा की सहायक नदियाँ
जलवायु
छोटा नागपुर का पठार उपोष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु क्षेत्र में आता है। यहाँ का मौसम आमतौर पर इस प्रकार होता है:
- ग्रीष्मकाल (मार्च–जून): तापमान 30-45°C तक
- वर्षाकाल (जुलाई–सितंबर): औसत वर्षा 1100-1600 मिमी
- शीतकाल (अक्टूबर–फरवरी): तापमान 5–20°C तक
ठंडी हवाओं और घने जंगलों के कारण शीतकाल में मौसम काफी सुहावना होता है।
वनस्पति और जैव विविधता
यह पठारी क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित है। यहाँ की वनस्पति उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों की श्रेणी में आती है। प्रमुख वृक्षों में शामिल हैं:
- साल (Shorea robusta) – राज्य का प्रमुख वृक्ष
- महुआ
- तेन्दू
- आंवला
- बांस
यहाँ की जैव विविधता में बाघ, हाथी, भालू, हिरण, तेंदुआ, मोर और विभिन्न प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। पलामू टाइगर रिज़र्व, हजारीबाग वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी और अन्य अभयारण्यों में इन प्रजातियों को संरक्षित किया गया है।
खनिज संपदा
छोटा नागपुर का पठार खनिज संपदा से समृद्ध है। इसे भारत का खनिज घर (Mineral House of India) कहा जाता है। प्रमुख खनिज:
- कोयला (Coal): धनबाद, बोकारो, गिरिडीह
- लौह अयस्क (Iron Ore): सिंहभूम
- बॉक्साइट: लोहरदगा
- अभ्रक (Mica): कोडरमा, गिरिडीह
- यूरेनियम: जादूगोड़ा (पूर्वी सिंहभूम)
- तांबा: सिंहभूम
खनिज संसाधनों के कारण यहाँ भारी उद्योगों का विकास हुआ है जैसे स्टील प्लांट्स, पावर प्लांट्स और मशीनरी निर्माण।
कृषि और जलवायु की भूमिका
पठारी भूमि में कृषियोग्यता सीमित होती है, परंतु मानसून की वर्षा के दौरान धान, मकई, दलहन और तिलहन की खेती की जाती है। यहां की जनजातियाँ पारंपरिक कृषि पद्धतियों पर निर्भर हैं जैसे:
- झूम खेती (स्थानांतरण कृषि)
- सहजल खेती – कम जल उपयोग वाली पद्धति
जनजातीय संस्कृति और सामाजिक जीवन
छोटा नागपुर का पठार झारखंड की जनजातीय आत्मा को जीवंत करता है। यहाँ संथाल, मुंडा, हो, उरांव, बिरहोर, पहाड़िया जैसी जनजातियाँ रहती हैं। इनकी संस्कृति में निम्न शामिल हैं:
- लोकनृत्य: सरहुल नृत्य, पाहन नृत्य, डोमकच
- पर्व: करम, सोहराय, सरहुल
- भाषा: संथाली, मुंडारी, हो, कुरुख
- पहनावा: रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र
जनजातीय जीवन प्रकृति-आधारित है और इनके जीवन का हर पहलू भूमि, जंगल और जल से जुड़ा है।
पर्यटन स्थल
छोटा नागपुर का पठार कई पर्यटन स्थलों का केंद्र है:
- नेतरहाट – “झारखंड का शिमला”
- हजारीबाग नेशनल पार्क
- जोन्हा, दशम, हुंडरू जलप्रपात
- देवघर – बाबा बैद्यनाथ धाम
- पलामू किला और टाइगर रिज़र्व
ये स्थल पर्यटकों को प्रकृति, इतिहास और संस्कृति का अद्वितीय संगम प्रदान करते हैं।
पर्यावरणीय चुनौतियाँ
- खनन और वनों की कटाई
- प्रदूषण – जल, वायु और ध्वनि
- जनजातीय विस्थापन
- जल स्रोतों का क्षरण
इन समस्याओं का समाधान सतत विकास और पर्यावरणीय संरक्षण नीतियों से ही संभव है।
निष्कर्ष
छोटा नागपुर का पठार न केवल झारखंड का भौगोलिक आधार है, Chota Nagpur Plateau बल्कि यह राज्य की आत्मा, संस्कृति, जीवनशैली और अर्थव्यवस्था का मूल भी है। Chota Nagpur Plateau इसकी प्राकृतिक सुंदरता, खनिज संपदा, वन्य जीवन और जनजातीय संस्कृति इसे भारत के सबसे अनोखे क्षेत्रों में स्थान दिलाते हैं। यह आवश्यक है कि हम इसके सतत विकास के लिए नीतियाँ बनाएं, जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करें और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखें।
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