भारत के स्वतंत्रता संग्राम में Ram Manohar Lohia ऐसे व्यक्तित्व हुए जिन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई, बल्कि आज़ादी के बाद भारत के सामाजिक और राजनीतिक निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। डॉ. राम मनोहर लोहिया ऐसे ही एक युगपुरुष थे। वे न केवल एक क्रांतिकारी चिंतक थे, बल्कि समाजवादी आंदोलन के मजबूत स्तंभ, तेजस्वी वक्ता और आम जनमानस के नेता भी थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जिले के अकबरपुर नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता हेरालाल लोहिया एक राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े शिक्षक थे, जिनसे राम मनोहर को स्वतंत्रता और समाजसेवा की प्रेरणा मिली।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा बनारस और मुंबई में हुई।
- उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. किया और उसके बाद जर्मनी की लिपजिग यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उनका शोध विषय था – “भारत में नमक सत्याग्रह का सामाजिक प्रभाव”।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
डॉ. लोहिया की राजनीतिक सक्रियता गाँधीजी के आंदोलन से शुरू हुई। वे 1930 के दशक में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने देखा कि कांग्रेस के भीतर भी आर्थिक और सामाजिक समानता की बातें पीछे छूट रही हैं।
कुछ प्रमुख योगदान:
- 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना में सहयोग किया, जो समाजवादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए कांग्रेस के भीतर ही एक अलग धारा थी।
- 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने भूमिगत होकर गुप्त रूप से क्रांतिकारी कार्य किए।
- अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए जाने पर लाहौर जेल में अमानवीय यातनाएं झेलीं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
समाजवादी आंदोलन और लोहिया की विचारधारा
समाजवाद की भारतीय व्याख्या
डॉ. लोहिया ने पश्चिमी समाजवाद की नकल नहीं की, बल्कि भारत की सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए एक स्वदेशी समाजवाद की नींव रखी। वे मानते थे कि जातिवाद, भेदभाव, और आर्थिक विषमता जैसे मुद्दों को सुलझाए बिना भारत का समग्र विकास संभव नहीं है।
उनके प्रमुख विचार:
- जाति तोड़ो आंदोलन: उन्होंने कहा था कि सामाजिक क्रांति के बिना आर्थिक समानता अधूरी है।
- अंग्रेज़ी हटाओ: उनका मानना था कि अंग्रेज़ी भाषा भारत में प्रशासन और ज्ञान का माध्यम बनी रहकर सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देती है।
- पांच उद्योग, पांच कार्य: उन्होंने ग्राम-उद्योग, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क पर केंद्रित विकास की बात कही।
- पुरुष और स्त्री की समानता: वे नारी अधिकारों के भी प्रबल समर्थक थे।
राजनीतिक करियर
संसदीय भूमिका:
- 1963 में फरूखाबाद (उत्तर प्रदेश) से लोकसभा सांसद चुने गए।
- उन्होंने संसद में प्रभावशाली भाषण दिए जिनमें सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार होता था।
- उनका सबसे प्रसिद्ध भाषण पंडित नेहरू के विरुद्ध था, जब उन्होंने हज़ारों की भीड़ में नेहरू की विदेश नीति पर सवाल उठाए और कहा – “विदेशों में चमकने से पहले देश के गांवों को रोशन कीजिए।”
राजनीतिक दल:
- 1955 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का गठन किया।
- वे कभी सत्ता के लालच में नहीं पड़े, बल्कि नीतियों और विचारधारा को प्राथमिकता दी।
लेखन और पत्रकारिता
Ram Manohar Lohia न केवल एक नेता थे, बल्कि एक गहरे विचारक और लेखक भी थे। उनके लेख आज भी प्रेरणास्रोत हैं।
प्रमुख रचनाएं:
- “व्हाई सोशलिज्म?”
- “भारत विभाजन के दोषी”
- “अंग्रेज़ी हटाओ”
- “सप्त क्रांति का घोषणापत्र”
इन लेखों में उन्होंने सामाजिक सुधार, राष्ट्रभक्ति, भारतीयता, और धर्मनिरपेक्षता पर विस्तृत विमर्श किया है।

लोहिया की “सप्त क्रांति”
Ram Manohar Lohia ने “सप्त क्रांति” (Seven Revolutions) का सिद्धांत प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने समाज के हर क्षेत्र में परिवर्तन की आवश्यकता बताई:
- रंगभेद के खिलाफ क्रांति
- जातिवाद के खिलाफ क्रांति
- लिंगभेद के खिलाफ क्रांति
- निजी पूंजी के विरुद्ध
- हथियारों के खिलाफ
- अशिक्षा के विरुद्ध
- औपनिवेशिक मानसिकता के खिलाफ
यह अवधारणा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी लोहिया के समय में थी।
आलोचना और विरोध
- डॉ. लोहिया पर यह आरोप भी लगते थे कि वे बहुत अधिक आदर्शवादी थे और राजनीतिक रणनीति में कमजोर थे।
- लेकिन उनके आलोचक भी उनकी ईमानदारी, साहस, और बौद्धिक श्रेष्ठता को मानते थे।
निधन और विरासत
12 अक्टूबर 1967 को डॉ. लोहिया का निधन हुआ। उन्होंने अपना सारा जीवन गरीबों, किसानों, महिलाओं और वंचित वर्गों की आवाज़ बनने में लगा दिया।
उनकी विरासत:
- देश भर में कई विश्वविद्यालय, संस्थान, और सड़कें उनके नाम पर हैं।
- “लोहिया अस्पताल” और “डॉ. राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय” जैसे संस्थान आज उनके विचारों की याद दिलाते हैं।
- समाजवादी नेताओं जैसे मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार आदि ने लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाया।
निष्कर्ष
डॉ. राम मनोहर लोहिया सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक आंदोलन, एक विचार और एक प्रेरणा थे। वे उस भारत की कल्पना करते थे जहाँ समानता, स्वतंत्रता और न्याय केवल संविधान में नहीं बल्कि ज़मीनी हकीकत में दिखाई दे। आज जब देश कई तरह की सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब लोहिया के विचार और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।
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