Chand Bhairav – टाना भगत आंदोलन के प्रमुख नेता

भारत की स्वतंत्रता संग्राम की कहानी में केवल बड़े राजनीतिक आंदोलनों का ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और जनजातीय आंदोलनों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। झारखंड में हुआ टाना भगत आंदोलन ऐसा ही एक आंदोलन था,Chand Bhairav जिसने आदिवासी समाज को ब्रिटिश शासन और शोषण के खिलाफ जागरूक किया। इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में चांद और भैरव का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।


टाना भगत आंदोलन की पृष्ठभूमि

Tana Bhagat आंदोलन की शुरुआत 1914 में हुई। इसका उद्देश्य आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन के अधिकार दिलाना था। अंग्रेजों द्वारा लगाए गए कर, जमींदारों और महाजनों के शोषण ने आदिवासी समाज को गरीबी और कर्ज के जाल में फंसा दिया था।

Tana Bhagat आंदोलन का एक बड़ा पहलू यह था कि यह आंदोलन सामाजिक सुधारों से भी जुड़ा था। आंदोलन के अनुयायी शराब, मांसाहार और सामाजिक बुराइयों से दूर रहते थे। वे सफेद धोती, साफ कपड़े और गांधी टोपी पहनते थे।


Chand Bhairav का प्रारंभिक जीवन

चांद और भैरव झारखंड के एक साधारण आदिवासी परिवार से थे। बचपन से ही उनमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस था। वे भगवान बिरसा मुंडा और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे।

दोनों भाइयों ने आदिवासियों को संगठित करने की शुरुआत की और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई।


chand bhairav Image
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टाना भगत आंदोलन में नेतृत्व

चांद-भैरव ने आंदोलन को संगठित और अनुशासित बनाया। उन्होंने आदिवासियों से कहा:

  • कर और लगान न दें।
  • अंग्रेजी अदालतों का बहिष्कार करें।
  • विदेशी कपड़ों का त्याग करें।
  • शराब और सामाजिक बुराइयों से दूर रहें।

उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन को समर्थन दिया और आंदोलन को पूरी तरह अहिंसक रखा।


आंदोलन की प्रमुख घटनाएं

  • 1920 में चंपारण सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर टाना भगत आंदोलन ने जोर पकड़ा।
  • हजारों आदिवासी किसान कर न देने लगे।
  • ब्रिटिश हुकूमत ने दमनात्मक कार्रवाई की, कई टाना भगतों को गिरफ्तार किया गया।

योगदान और उपलब्धियां

चांद और भैरव ने आदिवासियों को एकजुट कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़ी चुनौती खड़ी की।

  • उन्होंने आदिवासी समाज में अहिंसा और सत्याग्रह की भावना जगाई।
  • आदिवासियों को स्वदेशी अपनाने और सामाजिक सुधारों के लिए प्रेरित किया।
  • उनका आंदोलन झारखंड के स्वतंत्रता संघर्ष में मील का पत्थर साबित हुआ।

विरासत

आज भी चांद-भैरव का नाम झारखंड के इतिहास में अमर है। टाना भगतों की परंपरा आज भी जीवित है। वे सत्य, अहिंसा और स्वदेशी के प्रतीक माने जाते हैं।


FAQ

1. चांद-भैरव कौन थे?

चांद और भैरव टाना भगत आंदोलन के प्रमुख नेता थे जिन्होंने आदिवासियों को संगठित किया।

2. टाना भगत आंदोलन कब शुरू हुआ?

यह आंदोलन 1914 में झारखंड में शुरू हुआ।

3. टाना भगत आंदोलन का उद्देश्य क्या था?

अंग्रेजों और जमींदारों के शोषण के खिलाफ संघर्ष करना और आदिवासी समाज में सुधार लाना।

4. चांद-भैरव का योगदान क्या था?

उन्होंने आदिवासियों को कर न देने, स्वदेशी अपनाने और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।

5. आज टाना भगतों की परंपरा कैसी है?

आज भी टाना भगत अहिंसा, सत्याग्रह और स्वदेशी की राह पर चलते हैं।


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